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बुधवार, जुलाई 12, 2006

क्या हर मुसलमान बुरा होता है-2


पिछली प्रविष्टी लिखने से मेरा आशय किसी भी धर्म को क्लीन चिट देना या बुरा कहना से नहीं है। मेरे लेखों में कई विरोधाभास हो सकते हैं, उस का उत्तर मैं आगे देने की कोशिश करूंगा।
अच्छाई और बुराई यह मानवीय गुण है जो हर धर्म के लोगों में पाये जाते हैं। जिस तरह मैने शमीम मौसी को देखा है उस तरह एक और मुसलमान परिवार को देखा है जो हिन्दुओं से सख्त नफ़रत करते हैं।
उन दिनों की बात है जब मैं मोबाईल रिपेयरिंग का कोर्स मुंबई से सीख रहा था, रोज सुबह ५.३० की फ़्लाईंग रानी से मुंबई जाना और उसी ट्रेन से वापस आना।
एक दिन मुंबई से वापसी यात्रा के दौरान एक मुस्लिम परिवार साथ में था एक नवपरिणित महिला जो अपने मायके भरूच जा रही थी,एक ७-८ साल की बच्ची और उनके अब्बा भी थे। अब्बा और दीदी ऊँघने लगे और जैसा कि बच्चों की आदत होती है कविता बोलने/गुनगुनाने की बच्ची कुछ इस तरह बोलने लगी,
अल्लाह महान है
भगवान, भगवान नहीं शैतान है।
मैने बच्ची को पूछा आपको और क्या क्या आता है तो सुनिये उस ७-८ साल की बच्ची ने क्या बताया " भगवान दोजख/ जहन्नुम में रहते हैं और अल्लाह जन्नत में रहते है, हिन्दू काफ़िर होते हैं। और कई बाते उस नन्ही बच्ची ने हिन्दूओं के सम्मान में सुनायी जो यहाँ लिखी नहीं जा सकती। फ़िर मैने उस बच्ची को पूछा यह सब आपको किसने बताया । उसने कहा हमारे मदरसे के मौलवी साहब ने। उस बच्ची को मैने समझाय़ा नहीं बेटा यह गलत है ना हिन्दू बुरे होते हैं ना मुसलमान पर बच्ची के मन में जो बात इतनी दृढ़ता से बैठ चुकी थी वो उसके मन से नहीं निकला।
वह यही कहती रही हिन्दू बुरे होते हैं। उसने मुझे भी पूछ लिया आप हिन्दू हो अंकल? मैं क्या कहता उसे....?
आप सोचेंगे कि पहले मुसलमानों की तारीफ़ और अब यह पोष्ट... पर क्या किया जाये मैं ना तो तथाकथित सेक्युलर बन सका हुँ ना ही तोगड़िया और बाल ठाकरे की तरह कट्टर हिन्दू, ना आस्तिक हुँ ना ही नास्तिक, भगवान होते हैं या नहीं पता नहीं। तुष्टिकरण किसे कहते हैं पता नहीं।मैं अजमेर की दरगाह शरीफ़ भी जा चुका हुँ और अक्षरधाम भी। मेरे मकान मालिक आर जोशूआ साहब चुस्त ईसाई हैं और मेरी पत्नी को बेटी मानते हैं, मैने कई ईसाईयों को देखा है जो हिन्दुओं का दिया प्रसाद छूते भी नहीं पर जोशूआ साहब मेरे घर का प्रसाद भी खाते हैं।
मुझे कट्टरतावाद से सख्त नफ़रत है चाहे वो हिन्दू हो, मुसलमान हो या ईसाई हो। मैं मुकेश जी का यह भजन सही मानता हुँ-
सुर की गति मैं क्या जानूँ, एक भजन करना जानूँ ।
अर्थ भजन का भी अति गहरा, उसको भी मैं क्या जानूँ ॥
प्रभु प्रभु कहना जानुँ, नैना जल भरना जानूँ।
गुण गाये प्रभू न्याय ना छोड़े, फ़िर तुम क्यों गुण गाते हो।
मैं बोला मैं प्रेम दीवाना, इतनी बातें क्या जानूँ ॥
प्रभु प्रभु कहना जानुँ, नैना जल भरना जानूँ।
यहाँ सुनें
अन्त में:
अनुनाद जी: हम ऐसा कैसे मान ही लें कि हर बम विस्फ़ोट में किसी एक ही मजहब के लोगों का हाथ होता है? क्यों कि दाऊद इब्राहीम जैसे लोगों की गैंग में हर धर्म के गुंडे है जो हर तरह का काम करते हैं, मानता हुँ कि मुसलमान अधिक कट्टर होते हैं, हिन्दू नहीं और रोना भी इसी का है कि हिन्दूओं मैं ही एकता नहीं है। जैन,ब्राह्मण, कायस्थ , और ना जाने क्या क्या, जब तक सारे लोग हिन्दू नहीं हो जाते बम विस्फ़ोट होते ही रहेंगे। हम परिचर्चा में और यहाँ बहस करते ही रहेंगे फ़िर कुछ दिनों बाद ज्यों का त्यों। फ़िर कोई बम विस्फ़ोट होगा फ़िर बहस यह कब रूकेगी उपर वाला जाने।
पंकज भाई: मैं फ़िर कहुंगा कि सारे इस्लामी आतंकवादी नहीं है।

7 टिप्‍पणियां:

Neeraj ने कहा…

कई दिनों बाद सागर भाई के ब्लॉग पर आया हूं. बिना चाय पिए नहीं जाता लेकिन मेरे दिल की बात वो कह गए. मत-मतांतर की गुंजाइश औरों ने छोड़ी होगी. अपन ने नहीं लिहाज़ा मैं भावनाओं की क़द्र करते हुए सभी के लिए निदा फ़ाज़ली की ये गज़ल पेश कर रहा हूं.

मस्जिदों-मन्दिरों की दुनिया में
मुझको पहचानते कहां हैं लोग

रोज़ मैं चांद बन के आता हूं
दिन में सूरज सा जगमगाता हूं

खन-खनाता हूं मां के गहनों में
हंसता रहता हूं छुप के बाहों में

मैं ही मज़दूर के पसीने में
मैं ही बरसात के महीने में

मेरी तस्वीर आंख का आंसू
मेरी तहरीर जिस्म का जादू

मस्जिदों-मन्दिरों की दुनिया में
मुझको पहचानते नहीं जब लोग

मैं ज़मीनों को बे-ज़िया करके
आसमानों को लौट जाता हूं

मैं ख़ुदा बन के क़हर ढाता हूं
-निदा फाजली साहब

'तुम मुझे टिप्पणी दो, मैं तुम्हें टिप्पणी दूंगा' मैंने टीप दे दी. अब मेरा ब्लॉग भी पढ़ें. हा हा हा (Please dont mind. if we have)

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहां होता है
सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला
चिड़ियों को दाने बच्चों को गुड़धानी दे मौला... सर्वे भवन्तु सुखिन:

Tarun ने कहा…

सागर बहुत सही लिखा है लेकिन सेक्यूलर बनने की कोशिश में कट्टरता में हम पीछे ही रह गये

Pankaj Bengani ने कहा…

और भाईसा मै भी वही कह रहा हुँ कि सारे मुसलमान दूध के धूले नही है. सरकार जो तुष्टिकरण कर रही है, उसका विरोध होना चाहिए

संजय बेंगाणी ने कहा…

हर माँ-बाप को अपने बच्चे अच्छे लगते हैं, पर बिगड़ेल बच्चे को ठीक करना भी आना चाहिए. वरना वे ही नहीं दुसरे भी इसका परीणाम भोगते हैं.
सन्दर्भ आप खुद सोच लो.

Nidhi ने कहा…

मैं सागर भाई से सहमत हूँ । हर मुसलमान बुरा नहीं होता और हर हिन्दू अच्छा नहीं होता । दु:ख की बात यही है कि हम इन्सान को उसके धर्म से जोड़ देते हैं । सागर जी ने जो बातें छोटी बच्ची के मुख से सुनी, कई हिन्दू भी मुस्लिम समुदाय के लिये ऐसा ही कहते मिल जायेंगे । मेरा मानना है कि हमें धर्म के बजाय इन्सान को परखना चाहिये । पंकज जी और संजय जी की इस बात से सहमत हूँ कि दोषी को दंड देना आवश्यक है....फिर वह चाहे किसी भी संप्रदाय का हो । किंतु दोषी सिर्फ़ एक समुदाय हो यह हमेशा ज़रूरी नहीं । किसी एक के किये की सज़ा पूरे समुदाय को बुरा मान के देना ग़लत है ना !

विश्व हिन्दू समाज ने कहा…

हिन्‍दुत्‍व अथवा हिन्‍दू धर्म

हिन्‍दुत्‍व एक जीवन पद्धति अथवा जीवन दर्शन है जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को परम लक्ष्‍य मानकर व्‍यक्ति या समाज को नैतिक, भौतिक, मानसि‍क, एवं आध्‍यात्मिक उन्‍नति के अवसर प्रदान करता है। आज हम जिस संस्‍कृति को हिन्‍दू संस्‍कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय या भारतीय मूल के लोग सनातन धर्म या शाश्‍वत नियम कहते हैं वह उस मजहब से बड़ा सिद्धान्‍त है जिसे पश्चिम के लोग समझते हैं।

अधिक के लिये देखियेः http://vishwahindusamaj.com

चिठ्ठाजगत में स्वागतम्

ग़रिमा ने कहा…

आप जानते हैं भईया परेशानी क्या है... लोग सम्प्रदाय का तगमा लगा लेते हैं.. छूट मिल जाती है किसी और के बारे मे (सम्प्रदाय) बोलने के लिये।

किसी फिल्म का एक सीन था कि एक लावारिस हिन्दू बच्चा कही पडा हूआ था... किसी ने उस बच्चे को नही देखा... कुछ देर बाद एक मुस्लिम महिला उसे अपने घर ले आयी तो हिन्दूओ के अन्दर ममता जाग गयी.... ऐसे कई किस्से आम जिन्दगी मे मिल जाते हैं...

मेरे खयाल से ऐसे लोग हिन्दू-मुस्लिम होने का अर्थ ही नही जानते।
खैर इस्लाम का अर्थ तो मै नही जानती... और हिन्दू का भी नही जानती थी... मुझे एक ईसायी महिला ने बताया हिन्दू होने का अर्थ क्या होता है, तत्पश्चात मैने अपने दादा जी से पूछा था, उसके बाद मूझे अपने आप पर गर्व होता है कि मै वास्तव मे हिन्दू हूँ।

महिला के अनुसार-

जो दो से हीन हो जाये उसे हिन्दू कहते हैं... मतलब कि जिसे मेरा तुम्हारा ना दिखे बस मेरा दिखे... मेरे लोग, मेरे आदमी, मेरा समाज... अब कोई मेरे से झगडा नही करता, अपनो पर चाकू कोई नही चलाता, चाकू उसी पर चलता है जहां द्वैत भाव आये... सुना है आजकल भाई-भाई एक दुसरे को मार रहे हैं, ऐसा तभी होता है मेरा भाई कि अभिव्यक्ति मिटकर वहा दुसरेपन का आभास हो...

आपका मै कितना विशाल होना चाहिये.. पूरे प्राणी आपके कुटुम्ब मे आ जाये... तभी तो कहा गया है

"वसूधैव कुटुम्बकम"

ये है हिन्दू धर्म। मेरा धर्म... इसमे किसी इंसान के लिये कोई दुर्भावना नही.. क्यूँकि सब मेरे हैं

तभी तो "मै और कुछ नही"